वो पैदल चल रहे हैं
बस फर्क इतना है की वो पैदल चल रहे हैं और वो जहाजों से निकल पड़े थे। पैरो से ठोकर खाकर कंकड़ पत्थर बिखर रहे थे चारो तरफ इंसान ही इंसान अब यु राहे बदल रहे थे की छाले पैरो के भी बेबस हुए पिघल रहे थे बस फर्क इतना है की वो पैदल चल रहे हैं और वो जहाजों से निकल पड़े थे। लाचार सी पथराई आँखें एक दुसरे के अंदर झाँक रहे थे भूख प्यास की तो कहाँ बस मंजिले कारवां बयाँ कर रहे थे। बस फर्क इतना है की वो पैदल चल रहे हैं और वो जहाजों से निकल पड़े थे। अठखेलियों को छोड़ वो पावं मासूम से बचपन की , राहों की कंकड़ पत्थर पर दौड़ रहे थे गिर कर संभलते संभल कर गिरते अपनों की गिड़गिड़ाई आंखें जो आसानी से न पिघलते...