वो पैदल चल रहे हैं
बस फर्क इतना है की वो पैदल चल रहे हैं और
वो जहाजों से निकल पड़े थे।
पैरो से ठोकर खाकर
कंकड़ पत्थर बिखर रहे थे
चारो तरफ इंसान ही इंसान अब यु राहे बदल रहे थे
की छाले पैरो के भी बेबस हुए पिघल रहे थे
बस फर्क इतना है की वो पैदल चल रहे हैं और
वो जहाजों से निकल पड़े थे।
लाचार सी पथराई आँखें
एक दुसरे के अंदर झाँक रहे थे
भूख प्यास की तो कहाँ
बस मंजिले कारवां बयाँ कर रहे थे।
बस फर्क इतना है की वो पैदल चल रहे हैं और
वो जहाजों से निकल पड़े थे।
दौड़ रहे थे
गिर कर संभलते संभल कर गिरते
अपनों की गिड़गिड़ाई आंखें जो आसानी से न पिघलते
क्यू की वो पैदल चल रहे हैं और
वो जहाजों से निकल पड़े थे।
ये कुदरत ही है जिसको देखा मैंने यु बदलते
की इंसानो के बीच अब दूरियां हैं पलते
स्वच्छ हवा स्वच्छ पानी
हाँ हाँ ये कुदरत ही है जिसको देखा मैंने यूँ बदलते
ये कुदरत ही है जिसको देखा मैंने यूँ बदलते


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